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Opinion: रिश्तों की कीमत पर चुप होती स्त्री: दीपा शर्मा

Opinion: रिश्तों की कीमत पर चुप होती स्त्री: दीपा शर्मा

Opinion: स्त्री का जीवन जन्म से ही रिश्तों की जिम्मेदारियों से घिरा रहता है। जैसे ही वह दुनिया में आती है, उसे यह सिखाया जाने लगता है कि उसे दूसरों के लिए जीना है। कभी बेटी बनकर माता-पिता की उम्मीदों को संभालना है, कभी बहन बनकर त्याग करना है, फिर पत्नी बनकर घर को जोड़कर रखना है, बहू बनकर सबके अनुसार खुद को ढालना है और माँ बनकर अपनी सारी इच्छाओं को बच्चों के भविष्य पर न्योछावर कर देना है। इन सभी भूमिकाओं के बीच कहीं न कहीं वह खुद से दूर होती चली जाती है, लेकिन समाज इसे उसकी मजबूती और महानता का नाम देता है।

अक्सर स्त्री वही करती है, जो उससे अपेक्षित होता है। उसका मन कुछ और चाहता है, लेकिन परिस्थितियाँ उसे कुछ और करने पर मजबूर कर देती हैं। परिवार की इज्ज़त, समाज का डर और रिश्ते टूट जाने की आशंका उसके हर निर्णय पर भारी पड़ती है। वह जानती है कि अगर उसने अपनी बात रखी, तो उसे जिद्दी, स्वार्थी या असहयोगी कहा जा सकता है। इसलिए वह चुप रहना सीख लेती है। यह चुप्पी धीरे-धीरे उसकी आदत बन जाती है और एक दिन उसकी पहचान।
कई स्त्रियाँ बचपन से सपने देखती हैं। कोई पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनना चाहती है, कोई किसी खास क्षेत्र में नाम कमाना चाहती है, तो कोई बस अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, जिम्मेदारियाँ सपनों पर भारी पड़ने लगती हैं। कभी कहा जाता है कि अभी घर की हालत ठीक नहीं है, कभी यह तर्क दिया जाता है कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। शादी के बाद कहा जाता है कि अब परिवार की जिम्मेदारी है। इस तरह सपने एक-एक करके पीछे छूटते जाते हैं और स्त्री उन्हें अपने मन के किसी कोने में दफन कर देती है।


रिश्तों में स्त्री की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है, जब उसका मन साफ़ मना कर रहा होता है, लेकिन उसे “हाँ” कहनी पड़ती है। वह अपनी असहमति को निगल जाती है, अपनी पीड़ा को मुस्कान में छिपा लेती है। उसे सिखाया गया है कि घर की शांति सबसे ज़रूरी है, भले ही उसकी अपनी शांति खो जाए। वह सोचती है कि थोड़ा सह लेने से रिश्ता बच जाएगा। लेकिन हर बार सहने के साथ उसके भीतर कुछ टूटता जाता है।

पति-पत्नी के रिश्ते में भी स्त्री से यही उम्मीद की जाती है कि वह हर परिस्थिति में समझदारी दिखाए। अगर पति की कोई बात उसे चोट पहुँचाती है, तो वह अक्सर बोलती नहीं है। उसे डर लगता है कि बात बढ़ेगी, झगड़ा होगा, घर का माहौल बिगड़ जाएगा। वह सोचती है कि चुप रहना ही बेहतर है। बाहर से सब ठीक लगता है, लेकिन भीतर उसकी भावनाएँ अनसुनी रह जाती हैं। धीरे-धीरे यह खामोशी रिश्ते में दूरी पैदा कर देती है।

बहू बनने के बाद स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नए घर में खुद को पूरी तरह बदल ले। उसकी पसंद, उसकी आदतें, उसका स्वभाव — सब कुछ नए नियमों के अनुसार ढालने की उम्मीद की जाती है। अगर वह अपनी बात रखे, तो कहा जाता है कि वह एडजस्ट नहीं कर पा रही है। माँ बनने के बाद तो उसकी पूरी दुनिया बच्चों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। वह अपने स्वास्थ्य, अपने मन और अपने सपनों को पीछे छोड़ देती है। वह इसे अपना कर्तव्य समझती है, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि इस कर्तव्य की कीमत वह कितनी चुप्पी के साथ चुका रही है।

जब स्त्री मन मारकर कोई निर्णय ले लेती है, तब असली पीड़ा समय के साथ सामने आती है। रात की खामोशी में उसके मन में सवाल उठते हैं। वह खुद से पूछती है कि क्या उसकी भावनाओं की कोई अहमियत नहीं थी। क्या उसकी इच्छाएँ हमेशा दूसरों के बाद ही आएँगी। ये सवाल उसे भीतर से थका देते हैं, लेकिन सुबह होते ही वह फिर वही भूमिका निभाने लगती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

दोस्ती में भी स्त्री अक्सर ज़्यादा सहन करती है। अगर कोई दोस्त उसकी भावनाओं को न समझे या बार-बार उसे नीचा दिखाए, तो भी वह रिश्ते को बचाने की कोशिश करती है। वह सोचती है कि शायद सामने वाला बदल जाएगा। लेकिन बार-बार का अपमान और अनदेखी उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती है। फिर भी वह मुस्कुराकर सब सह लेती है, क्योंकि उसे रिश्ते टूटने से डर लगता है।

स्त्री की घुटन सबसे ज़्यादा खतरनाक इसलिए होती है, क्योंकि वह दिखाई नहीं देती। बाहर से वह सब संभालती हुई नज़र आती है। लोग कहते हैं कि वह कितनी मजबूत है, कितनी सहनशील है। लेकिन कोई यह नहीं देखता कि वह भीतर से कितनी थकी हुई है। वह हँसती है, बात करती है, रिश्ते निभाती है, लेकिन उसका मन भारी रहता है। उसे उन्हीं लोगों के बीच अकेलापन महसूस होने लगता है, जिनके लिए उसने खुद को पीछे रखा।

अतीत की चुप्पियाँ बार-बार उसके मन में लौट आती हैं। वह सोचती है कि काश उसने उस दिन अपनी बात रखी होती। वर्तमान में सब सामान्य होते हुए भी पुरानी चोटें उसे चैन से जीने नहीं देतीं। यही वजह है कि रिश्ते निभाते-निभाते वह भीतर से खाली महसूस करने लगती है।

हमारा समाज स्त्री के त्याग को बहुत ऊँचा दर्जा देता है। उससे कहा जाता है कि त्याग ही उसका सबसे बड़ा गुण है। लेकिन हर त्याग प्रेम नहीं होता। जब त्याग के नाम पर स्त्री अपनी पहचान, अपनी आवाज़ और अपने सपने खो देती है, तब वह प्रेम नहीं, बल्कि खुद से किया गया अन्याय होता है। स्त्री का मन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना उसके रिश्ते।
रिश्तों के लिए खुद को पीछे रखना स्त्री की कमजोरी नहीं है। यह उसकी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का परिणाम है। लेकिन अब समय आ गया है कि स्त्री की चुप्पी को उसकी सहमति न समझा जाए। रिश्ते तभी सच्चे होते हैं, जब उनमें स्त्री को बोलने की जगह मिले, जब उसकी भावनाओं को सम्मान दिया जाए।

मन नहीं होते हुए भी रिश्तों के लिए किया गया हर समझौता स्त्री के भीतर एक कहानी छोड़ जाता है। कुछ कहानियाँ उसे मजबूत बनाती हैं और कुछ उसे भीतर से थका देती हैं। ज़रूरत इस बात की है कि हर स्त्री खुद से यह सवाल पूछे कि क्या वह इस रिश्ते में खुद के साथ ईमानदार है। क्योंकि स्त्री सिर्फ़ निभाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे मन और सम्मान के साथ जीने के लिए बनी है।

विकास मलिक

विकास मलिक 18 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। विकास मलिक ने इंडिया न्यूज, इंडिया न्यूज़ हरियाणा, साधना न्यूज, एमएचवन न्यूज, खबरें अभी तक, न्यूज नेशन, लीविंग इंडिया न्यूज़ समेत कई बड़े चैनल्स में काम किया है। विकास मलिक अभी जिओ हॉटस्टार में हरियाणावी कमेंट्री में बतौर प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं और साथ में अपनी खुद की वेबसाइट चला रहे है। इनकी कंटेंट से लेकर खेल और राजनीति के साथ हरियाणा पर गहरी पकड़ है।

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