National Human Rights Commission: भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 32वें स्थापना दिवस समारोह को किया संबोधित
National Human Rights Commission: भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 32वें स्थापना दिवस समारोह को किया संबोधित

National Human Rights Commission: भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 32वें स्थापना दिवस समारोह को किया संबोधित
हरियाणा मानव अधिकार आयोग के माननीय सदस्य श्री दीप भाटिया ने की सहभागिता
हरियाणा में जेल सुधारों की सराहना — बंदियों के मानवाधिकार संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास जारी
‘जेल कैदियों के मानवाधिकार’ पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि जेलें केवल बंदीगृह नहीं बल्कि सुधार, पुनर्वास और आशा के केंद्र बनें
दिल्ली/चंडीगढ़ 16 अक्टूबर – राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने आज अपना 32वां स्थापना दिवस विज्ञान भवन, नई दिल्ली में मनाया। इस अवसर पर आयोग ने “जेल कैदियों के मानवाधिकार” विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का भी आयोजन किया। आयोग की स्थापना 12 अक्तूबर 1993 को की गई थी।
मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने कहा कि आधुनिक मानवाधिकार की परिकल्पना से बहुत पहले हमारे ऋषियों और ग्रंथों ने धर्म पालन, करुणा और न्याय के दायित्व की बात कही थी। यही शाश्वत नैतिक आधार आज भी हमारा मार्गदर्शन करता है और यह याद दिलाता है कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल कानूनी नहीं बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक दायित्व भी है — जो भारतीय जीवन पद्धति का अभिन्न अंग है। कार्यक्रम में माननीय सदस्य श्री दीप भाटिया ने हरियाणा मानवाधिकार आयोग का प्रतिनिधित्व किया|

श्री कोविंद ने कहा कि भारत ने मानवाधिकारों का एक सशक्त और व्यापक ढांचा तैयार किया है। 1993 में अपनी स्थापना के बाद से एनएचआरसी विश्व की सबसे प्रतिष्ठित मानवाधिकार संस्थाओं में से एक के रूप में विकसित हुई है। उन्होंने कहा कि इसके 32वें स्थापना दिवस का उत्सव केवल संस्थागत उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारे संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि का अवसर है।
उन्होंने कहा कि आयोग ने अपनी जांचों, सलाहों, हस्तक्षेपों और जन-जागरूकता के माध्यम से “निर्वाकों को वाणी दी है” और शासन की मुख्यधारा में मानवाधिकारों को केंद्र में लाने का कार्य किया है। भारत की सभ्यतागत भावना इस बात पर आधारित है कि किसी समाज का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि वह अपने सबसे कमजोर सदस्य के साथ कैसा व्यवहार करता है।
उन्होंने कहा कि “जेल कैदियों के मानवाधिकार” का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी समाज की असली परीक्षा इस बात में है कि वह अपने सबसे कमजोर और हिरासत में रहने वाले व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जेल प्रशासन का पवित्र कर्तव्य है कि हर बंदी के साथ मूलभूत मानवीय गरिमा का व्यवहार किया जाए। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि एनएचआरसी इस विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर रहा है ताकि जेलों में लैंगिक संवेदनशील और बाल-अनुकूल व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित किया जा सके। उन्होंने कहा कि जेलें केवल बंदीगृह नहीं बल्कि सुधार, पुनर्वास और आशा के केंद्र बननी चाहिएं। उन्होंने सभी हितधारकों, विशेष रूप से जेल अधिकारियों से इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर श्री दीप भाटिया ने बताया कि हरियाणा मानव अधिकार आयोग राज्य की विभिन्न जेलों का नियमित रूप से निरीक्षण करता है, जिसके परिणामस्वरूप जेलों की कार्यप्रणाली में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिले हैं। उन्होंने कहा कि आज हरियाणा की जेलों में कपड़े धोने की मशीनों से लेकर रोटी बनाने की मशीनों तक की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।
उन्होंने यह भी बताया कि बंदियों की पैरोल प्रणाली को पूर्णतः स्वचालित (ऑटोमेटेड) बनाने के लिए आयोग ने राज्य सरकार को सुझाव दिए हैं, जिन पर हरियाणा जेल विभाग सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है। इसके अतिरिक्त, हरियाणा की जेलों में कम्युनिटी रेडियो, वोकेशनल कोर्सेज और अन्य पुनर्वास कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं, जिससे बंदियों के पुनर्समूहीकरण में सहायता मिल रही है।
हरियाणा मानव अधिकार आयोग के प्रोटोकॉल, सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी ने बताया कि सम्मेलन के दौरान लेडी श्रीराम कॉलेज की एचओडी प्रोफेसर डॉ. वर्तिका नंदा ने “जेल कैदियों के मानवाधिकार” विषय पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में हरियाणा में किए गए महत्वपूर्ण सुधारों का विशेष उल्लेख किया गया, जो देश के अन्य राज्यों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण हैं।
हरियाणा मानव अधिकार आयोग के सदस्य श्री दीप भाटिया ने कहा कि आयोग का उद्देश्य न केवल मानवाधिकारों की रक्षा करना है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करना भी है।
श्री कोविंद ने सरकारों द्वारा नागरिकों, विशेषकर समाज के वंचित वर्गों के जीवन में सुधार के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की — जैसे स्वच्छता, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की सुविधाएं प्रदान करना। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 जैसे कानूनों को भारत की मानवाधिकारों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण बताया।
उन्होंने कहा कि हमारा संविधान हमें याद दिलाता है कि अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जुड़े हैं। स्वतंत्रता का उपयोग सामूहिक कल्याण के साथ सामंजस्य में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल एनएचआरसी की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना के अनुरूप एक अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और समावेशी भारत के निर्माण के लिए सभी से पुनः संकल्प लेने का आग्रह किया।







