
Haryana News: हरियाणा सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के कर्मचारी नीरज चोपडा, फोटोग्राफर पर एसीपी गबन के आरोप, पारदर्शिता की कसौटी पर प्रशासन
नीरज चोपडा पर आरटीआई का दबाव दिखाकर दो अवैध एसीपी स्वीकृत कराने का आरोप, सरकारी खजाने से 2 लाख रुपये से अधिक का गबन किया
दिल्ली, — हरियाणा के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली, वित्तीय अनुशासन और नैतिक मानकों पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। सूत्रों के अनुसार, नीरज चोपडा, जो हरियाणा के सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग में फोटोग्राफर के पद पर कार्यरत हैं, पर आरोप है कि उन्होंने कर्मचारियों और अधिकारियों पर दबाव बनाकर दो एसीपी (Assured Career Progression) का लाभ अवैध रूप से प्राप्त किया। इस कथित कार्रवाई के परिणामस्वरूप सरकारी खजाने से 2 लाख रुपये से अधिक की राशि जारी हुई।
यह मामला व्यापक प्रशासनिक प्रणाली में नियमों के अनुपालन, आंतरिक नियंत्रण तंत्र और वित्तीय निगरानी की मजबूती से जुड़ा हुआ है। एसीपी योजना का उद्देश्य कर्मचारियों को समयबद्ध वित्तीय उन्नयन प्रदान करना है, ताकि लंबे समय तक पदोन्नति न मिलने की स्थिति में उन्हें आर्थिक लाभ मिल सके। लेकिन यदि इस योजना का लाभ नियमों के विपरीत या आरटीआई दबाव के माध्यम से लिया जाए, तो यह योजना की मूल भावना और सरकारी नियमों दोनों के साथ अन्याय है।
प्रारंभिक तथ्यों के अनुसार, नीरज चोपडा पर यह आरोप है कि उन्होंने सेवा शर्तों और पात्रता मानकों की अनदेखी करते हुए आरटीआई का दबाव दिखाकर दो एसीपी का लाभ स्वीकृत कराया। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की कार्रवाई से न केवल वित्तीय अनियमितता उत्पन्न होती है, बल्कि कार्यस्थल की नैतिकता और अनुशासन भी प्रभावित होता है। यदि कोई कर्मचारी अपने पद, प्रभाव या आरटीआई जैसे कानून का दुरुपयोग कर अनुचित लाभ लेता है, तो इससे अन्य कर्मचारियों के मनोबल पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सरकारी वित्तीय नियम स्पष्ट करते हैं कि सार्वजनिक धन का उपयोग केवल निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत ही किया जाना चाहिए। एक रुपये का भी अनुचित भुगतान गबन की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में न केवल अतिरिक्त राशि की वसूली की जाती है, बल्कि संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध विभागीय और आवश्यक होने पर कानूनी कार्रवाई भी की जाती है। दो लाख रुपये से अधिक की कथित अतिरिक्त प्राप्ति इस मामले की गंभीरता को और बढ़ाती है।
एसीपी जैसे वित्तीय लाभों की स्वीकृति बहु-स्तरीय प्रक्रिया के तहत होती है, जिसमें सेवा रिकॉर्ड की जांच, पात्रता की पुष्टि और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति शामिल होती है। यदि इन चरणों में किसी भी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई है, तो यह प्रशासनिक तंत्र के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है। क्या आंतरिक नियंत्रण पर्याप्त थे? क्या सत्यापन प्रक्रिया में चूक हुई? या आरटीआई दबाव के कारण नियमों को दरकिनार किया गया? इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।
मामले के उजागर होने के बाद विभाग द्वारा संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा प्रारंभ कर दी गई है। सूत्रों के अनुसार, सेवा दस्तावेज, एसीपी स्वीकृति फाइलें और वित्तीय भुगतान विवरणों की गहन जांच की जा रही है। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो अतिरिक्त राशि की वसूली, विभागीय दंडात्मक कार्रवाई, वेतन कटौती, प्रतिकूल प्रविष्टि, निलंबन या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई संभव है। गंभीर परिस्थितियों में कानूनी प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है।
यह घटना प्रशासनिक पारदर्शिता की आवश्यकता को दिखाती है। डिजिटल युग में जब अधिकांश प्रक्रियाएं ऑनलाइन ट्रैक की जा रही हैं, तब भी यदि अनियमितता की गुंजाइश रहती है, तो यह निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता की ओर संकेत करता है। नियमित ऑडिट, पारदर्शी प्रमाणीकरण और स्पष्ट जवाबदेही व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक धन जनता के टैक्स से एकत्रित होता है, इसलिए उसका प्रत्येक उपयोग अत्यंत जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। नियमों का उल्लंघन न केवल वित्तीय नुकसान पहुंचाता है, बल्कि जनता के विश्वास को भी प्रभावित करता है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई ही प्रशासन की विश्वसनीयता को बनाए रख सकती है।
यह प्रकरण स्पष्ट करता है कि सरकारी तंत्र में जवाबदेही केवल औपचारिकता नहीं हो सकती। वास्तविक पारदर्शिता तभी सुनिश्चित होती है जब नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। पद छोटा हो या बड़ा, यदि किसी ने अनुचित लाभ लिया है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई अनिवार्य है। नीरज चोपडा से जुड़े इस एसीपी मामले में निष्पक्ष जांच, स्पष्ट निष्कर्ष और उचित कार्रवाई से ही यह संदेश जाएगा कि शासन व्यवस्था में ईमानदारी सर्वोपरि है। सरकारी धन का एक रुपया भी यदि नियमों के विरुद्ध प्राप्त किया जाता है, तो वह गबन की श्रेणी में आता है — और इस सिद्धांत से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।



