Haryana News: ‘चीफ फोटोग्राफर ऑफिसर’ पद पर उठे सवाल: विवादों और आरोपों के बीच क्या होगी निष्पक्ष जांच?
पुनर्नियुक्ति पर मचा बवाल: विभागीय अनुशासन और पारदर्शिता के घेरे में संभावित नियुक्ति
आरटीआई विवादों से घिरे कर्मचारी नीरज चोपड़ा को नई जिम्मेदारी? प्रशासनिक फैसले पर टिकी निगाहें
सेवानिवृत्ति के बाद नई तैनाती पर बहस: क्या विभाग करेगा तथ्यात्मक समीक्षा?
आरोपों के साये में अहम पद की चर्चा: क्या ‘चीफ फोटोग्राफर ऑफिसर’ नियुक्ति से पहले होगी पारदर्शी जांच?
दिल्ली, —हरियाणा के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में इन दिनों ‘‘चीफ फोटोग्राफर आफिसर’’ की संभावित पुनर्नियुक्ति को लेकर गहन चर्चा चल रही है। विभाग के फोटोग्राफर श्री नीरज चोपड़ा 28 फरवरी 2026 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, वे सेवानिवृत्ति उपरांत किसी एजेंसी अथवा संवाद समिति के माध्यम से पुनः कार्य करने की इच्छा जता चुके हैं। साथ ही उन्हें “चीफ फोटोग्राफर ऑफिसर” जैसे पद पर नियुक्त किए जाने की भी चर्चाएँ हैं। ऐसे में यह मामला केवल एक व्यक्ति की पुनर्नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह विभागीय कार्य-संस्कृति, पारदर्शिता और प्रशासनिक विवेक से जुड़ा व्यापक विषय बन गया है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, सेवा काल के दौरान उनके कार्य-व्यवहार को लेकर कई बार असंतोष व्यक्त किया गया। आरोप है कि उन्होंने अपने मूल दायित्वों के निर्वहन में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई और कई अवसरों पर विभागीय कार्यों में व्यवधान उत्पन्न किया। सहकर्मियों का कहना है कि उनका रवैया अक्सर असहयोगात्मक रहा, जिससे टीम वर्क प्रभावित हुआ। किसी भी सरकारी विभाग में समन्वय और सामूहिक कार्यसंस्कृति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी कर्मचारी का व्यवहार लगातार टकरावपूर्ण माना जाए, तो पुनर्नियुक्ति पर विचार करते समय इन पहलुओं की अनदेखी करना प्रशासनिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

सबसे अधिक चर्चा सूचना का अधिकार अधिनियम के अत्यधिक उपयोग को लेकर हो रही है। आरोप है कि संबंधित कर्मचारी द्वारा बड़ी संख्या में आरटीआई आवेदन दायर किए गए, जिनमें से कई ऐसे थे जिनका उद्देश्य केवल सूचना प्राप्ति नहीं, बल्कि अधिकारियों और कर्मचारियों पर मानसिक दबाव बनाना प्रतीत हुआ। यह भी कहा जा रहा है कि वर्तमान में भी आरटीआई को एक रणनीतिक औजार की तरह उपयोग कर कर्मचारियों को अपने अनुसार कार्य करने हेतु बाध्य करने का प्रयास किया जाता है। यह स्थिति विभागीय अनुशासन और कार्य-संस्कृति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। निश्चित रूप से आरटीआई एक वैधानिक अधिकार है, लेकिन उसका उद्देश्य पारदर्शिता है, न कि संस्थागत अस्थिरता।
कार्यालयीन संसाधनों के उपयोग को लेकर भी सवाल उठे हैं। विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, उन्हें कंप्यूटर, इंटरनेट और प्रिंटर जैसी सभी सुविधाएँ उपलब्ध थीं, लेकिन यह देखा गया कि वे प्रायः अपनी निर्धारित सीट पर उपस्थित नहीं रहते थे। एक कक्ष को ताला लगाकर अपने नियंत्रण में रखने तथा मीडिया सेंटर के कंप्यूटर को लॉक रखने जैसी शिकायतें भी सामने आईं। कार्यालयीन समय में आरटीआई से संबंधित फोटोकॉपी और प्रिंटिंग के लिए विभागीय संसाधनों के अत्यधिक उपयोग की बात भी कही गई है। यदि ये तथ्य सत्य हैं, तो यह सरकारी संसाधनों के संभावित दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकता है।
कार्य निष्पादन से जुड़े आरोप भी कम गंभीर नहीं हैं। बताया गया है कि महत्वपूर्ण कार्यक्रमों, विशेषकर उच्च स्तरीय दौरों के समय, वे प्रायः अवकाश ग्रहण कर लेते थे। इसके परिणामस्वरूप बाहरी फोटोग्राफरों को बुलाना पड़ता था, जिनके भुगतान का भार विभाग पर आता था। इससे अनावश्यक वित्तीय व्यय की स्थिति उत्पन्न होती रही। इसके विपरीत सामान्य कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति दर्ज होना कार्य निष्पादन की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करता है। यदि विभागीय रिकॉर्ड इन तथ्यों की पुष्टि करते हैं, तो यह प्रशासनिक समीक्षा का विषय अवश्य बनता है।
एक अन्य गंभीर आरोप अनुचित प्रभाव के उपयोग का है। कहा जाता है कि विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से निकटता स्थापित कर व्यक्तिगत सिफारिश प्राप्त करने का प्रयास किया गया। वरिष्ठ अधिकारियों के नाम और प्रभाव का उपयोग कर अधीनस्थ कर्मचारियों पर दबाव बनाए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। यदि यह प्रवृत्ति कार्यसंस्कृति का हिस्सा बन जाए, तो यह संस्थागत संतुलन को कमजोर कर सकती है।
पूर्व में एक अधिकारी द्वारा महानिदेशक को लिखित रूप से अवगत कराते हुए संबंधित कर्मचारी के व्यवहार और मानसिक संतुलन को लेकर चिंता व्यक्त किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। हालांकि किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर टिप्पणी अत्यंत संवेदनशील है, फिर भी यदि कार्यस्थल पर व्यवहार को लेकर बार-बार प्रश्न उठे हों, तो प्रशासन के लिए यह समीक्षा का विषय बनता है।
“चीफ फोटोग्राफर ऑफिसर” जैसे पद पर नियुक्ति केवल तकनीकी दक्षता का प्रश्न नहीं है। यह नेतृत्व, समन्वय और अनुशासन का भी पद है। यदि इस पद पर आसीन व्यक्ति के कार्य-व्यवहार को लेकर लगातार शिकायतें रही हों, तो विभागीय हित में पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ समीक्षा अनिवार्य हो जाती है।
इन परिस्थितियों के तहत यह अपेक्षा की जा रही है कि सेवानिवृत्ति उपरांत किसी भी प्रकार की पुनर्नियुक्ति, अनुबंध आधारित नियुक्ति अथवा संबद्ध एजेंसी में कार्य प्रदान करने से पूर्व निष्पक्ष और तथ्यात्मक समीक्षा की जाए। संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से लिखित अभिमत प्राप्त करना भी एक पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति नहीं, बल्कि विभागीय अनुशासन, संसाधनों के उचित उपयोग और स्वस्थ कार्य-संस्कृति से जुड़ा है। प्रशासन यदि संतुलित, निष्पक्ष और पारदर्शी निर्णय लेता है, तो न केवल विभाग की साख मजबूत होगी, बल्कि कर्मचारियों का विश्वास भी कायम रहेगा। समय की मांग है कि अनुभव, योग्यता और संस्थागत हित-तीनों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लिया जाए।



